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कागजों पर ‘नल’, धरातल पर ‘कल’ का इंतजार; कोरिया में जल जीवन मिशन के दावों की पोल खुली।

कोरिया, छत्तीसगढ़ रिपोर्टर: प्रदीप पाटकर।

केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘जल जीवन मिशन’ योजना कोरिया जिले में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक निकम्मेपन की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। जिला प्रशासन जहाँ वातानुकूलित कमरों में बैठकर फाइलों पर 58% से 70% कार्य पूर्ण होने का जश्न मना रहा है, वहीं जिले की प्यासी जनता आज भी पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष कर रही है। प्रशासन के ये ‘गुलाबी आंकड़े’ धरातल पर आकर ‘शून्य’ साबित हो रहे हैं।

प्रशासन की जादूगरी: फाइलों में पानी, पाइपलाइन में धूल।

कोरिया जिला प्रशासन की कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। कागजों में जिले की आधी से ज्यादा आबादी को ‘नल से जल’ मिलना शुरू हो गया है, लेकिन असलियत यह है कि करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने के बाद भी पाइपलाइनें सूखी पड़ी हैं। कई ग्राम पंचायतों में काम को ‘पूर्ण’ दिखाकर भुगतान भी कर दिया गया है, जबकि मौके पर पाइपलाइन बिछाने तक का काम अधूरा है। क्या प्रशासन की नाक के नीचे यह सब ‘अंधेर नगरी-चौपट राजा’ वाली तर्ज पर चल रहा है।जनता का मजाक नल के चबूतरों पर बंध रहे मवेशी ग्रामीण इलाकों की स्थिति और भी बदतर है। ग्रामीण क्षेत्रों में योजना के तहत बनाए गए नलों के प्लेटफॉर्म (चबूतरे) अब पानी देने के बजाय मवेशियों को बांधने के काम आ रहे हैं। करोड़ों के बजट से खड़ी की गई पानी की टंकियां सफेद हाथी साबित हो रही हैं। पाइपलाइन के नाम पर सड़कें खोदकर छोड़ दी गई हैं, जिससे ग्रामीणों को आवागमन में भी भारी परेशानी हो रही है। आखिर इस भारी-भरकम बजट की बंदरबांट का जिम्मेदार कौन है?

विभागीय बहानेबाजी या खुली लूट?

जब इस भ्रष्टाचार पर विभाग से जवाब मांगा जाता है, तो रटा-रटाया जवाब मिलता है— “पाइपलाइन टेस्टिंग जारी है” या “जल स्रोत नहीं मिल रहे”। सवाल यह उठता है कि यदि जल स्रोत नहीं थे, तो करोड़ों का टेंडर क्यों निकाला गया? और यदि टेस्टिंग चल रही है, तो दस्तावेजों में काम को ‘पूर्ण’ (Complete) दिखाकर जनता और सरकार की आंखों में धूल क्यों झोंकी जा रही है?

अधिकारियों की चुप्पी और कागजी ‘पलीता’

साफ जाहिर है कि प्रशासनिक दबाव और अपनी पीठ थपथपाने की होड़ में जिले के आला अधिकारी जमीनी हकीकत से मुंह मोड़ चुके हैं। दस्तावेजों का ‘पलीता’ निकालकर प्रगति को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना अब इस विभाग की पहचान बन चुका है। क्या कलेक्टर और संबंधित विभाग के उच्च अधिकारी इन अधूरे कार्यों की निष्पक्ष जांच कराएंगे, या फिर भ्रष्टाचार की इस ‘बहती गंगा’ में सब हाथ धोते रहेंगे?

कड़वा सच

प्रशासनिक दावा 70% तक कार्य प्रगति पर।जमीनी हकीकत नल के पाइप सूखे,जनता प्यासी और मवेशियों का कब्जा।सवाल फाइलों में पानी पहुँचाने वाले ‘जादूगर’ अधिकारियों पर कार्रवाई कब?

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