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वनांचल जिला MCB में ‘विकास’ का दिवाला, फाइलों में चमक और जमीन पर अंधेरा!

महेन्द्र शुक्ला की कलम से विशेष रिपोर्ट धरातल पर एमसीबी।

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प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ीं पंचायतें: वनांचल आज भी बदहाल

जिला MCB के दूरस्थ ग्रामीण इलाकों और वनांचल क्षेत्रों की स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है। सरकार की मंशा आदिवासियों और ग्रामीणों को मुख्यधारा से जोड़ने की है, लेकिन स्थानीय प्रशासन की सुस्ती ने इन सपनों पर पानी फेर दिया है। पंचायतों में मूलभूत सुविधाओं का अकाल है, और ग्रामीण आज भी बुनियादी हक के लिए तरस रहे हैं।

अनुबंधों का ‘खूनी खेल’: चहेतों को रेवड़ियाँ, जनता को धोखा।

पंचायतों में विकास कार्यों के नाम पर ‘अनुबंधों का खेल’ धड़ल्ले से चल रहा है। नियमों को ताक पर रखकर चहेते ठेकेदारों और बिचौलियों को लाभ पहुँचाया जा रहा है। कागजों पर काम पूरे दिखाए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर ईंट तक नहीं रखी गई। यह अनुबंध नहीं, बल्कि सरकारी खजाने की सुनियोजित लूट है।

करोड़ों का ‘वारा-न्यारा’: कहाँ गया विकास का बजट?

वनांचल क्षेत्रों के कायाकल्प के लिए आने वाली लाखों-करोड़ों की राशि आखिर जा कहाँ रही है? निर्माण कार्यों के नाम पर बड़ी रकम निकाली जा रही है, पर भ्रष्टाचार की दीमक उसे चट कर जा रही है। क्या यह पैसा विकास के लिए था या फिर भ्रष्ट तंत्र की जेबें भरने के लिए? इस ‘वारा-न्यारा’ की उच्च स्तरीय जांच अनिवार्य है।

आला अधिकारियों की ‘रहस्यमयी चुप्पी’: मौन या मिलीभगत?

सबसे बड़ा सवाल जिला प्रशासनिक अधिकारियों और जिला पंचायत सीईओ की कार्यशैली पर खड़ा होता है। जिले के इन दो सबसे रसूखदार अधिकारियों की चुप्पी कई गहरे संकेत दे रही है। क्या इन्हें जमीनी हकीकत का इल्म नहीं है, या फिर भ्रष्टाचार के इस खेल में ‘मौन सहमति’ दी गई है? जनता पूछ रही है—यह चुप्पी कब टूटेगी?

टेबल के नीचे से ‘विकास’: ग्राउंड रिपोर्ट बनाम कागजी रिपोर्ट।

क्या जिले के उच्च अधिकारियों तक ग्रामीण इलाकों की वास्तविक ग्राउंड रिपोर्ट पहुँचती भी है? ऐसा प्रतीत होता है कि ‘टेबल के नीचे’ से होने वाले लेन-देन ने विकास की परिभाषा ही बदल दी है। वातानुकूलित कमरों में बैठकर विकास की रूपरेखा तैयार की जा रही है, जबकि वनांचल का ग्रामीण आज भी कीचड़ भरी सड़कों और दूषित पानी के बीच जीने को मजबूर है।

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