सिघत जलाशय घोटाला! नहर निर्माण में करोड़ों की लुट* *अधिकारियों–ठेकेदारों की मिलीभगत में सरेआम बंट गई सरकारी राशि, गुणवत्ता शून्य – किसानों के साथ सबसे बड़ा छल*
सिघत जलाशय घोटाला! नहर निर्माण में करोड़ों की लुट* *अधिकारियों–ठेकेदारों की मिलीभगत में सरेआम बंट गई सरकारी राशि, गुणवत्ता शून्य – किसानों के साथ सबसे बड़ा छल*

*मनेन्द्रगढ़–चिरमिरी–भरतपुर।* सिघत जलाशय की नहर लाइनिंग निर्माण में चल रहा करोड़ों का भ्रष्टाचार आखिरकार बेनकाब हो गया है।
जांच में जो सामने आया है, उसे देखकर ग्रामीणों से लेकर निर्माण विशेषज्ञों तक सबके होश उड़ गए।
और यह खुलासा सुनते ही विभागीय अधिकारियों के चेहरों का रंग उड़ना स्वाभाविक है—
क्योंकि पूरा खेल उनकी नाक के नीचे नहीं बल्कि संरक्षण में खेला जा रहा है।
करोड़ों की नहर, ढलाई आधी—भ्रष्टाचार पूरा!


जहाँ निर्माण मापदंड के अनुसार 8 इंच बेसमेंट ढलाई अनिवार्य है,
ठेकेदार ने सिर्फ 4 इंच की कमजोर ढलाई कर पूरे सिस्टम के मुंह पर तमाचा मार दिया।
ऐसा निर्माण दो साल भी टिके—किसी इंजीनियर की इतनी हिम्मत नहीं कि गारंटी दे दे।
नहर निर्माण नहीं—कागजी इंजीनियरिंग का नंगा नाच!
निर्माण स्थल पर
वाइब्रेटर नहीं,
मानक मिक्सिंग नहीं,
RMC प्लांट नहीं,
सही मटेरियल नहीं,
कोई सुपरविजन नहीं।
जो चल रहा है वह सिर्फ और सिर्फ सरकारी धन की निर्लज्ज लूट है।

ओवरसाइज़ गिट्टी, कमजोर लोहा—ऐसी नहरें तो बारिश भी नहीं झेलेंगी
मानक 20 एमएम गिट्टी की जगह 30 एमएम ओवरसाइज़ गिट्टी,
60 सेंटीमीटर ढलाई में सिर्फ 8 एमएम की एक–एक छड़,
और वह भी ऐसे बंधी जैसे किसी कच्चे घर की बाड़ हो!
यह नहर नहीं—किसान हितों की हत्या है।
प्लास्टिक लाइनिंग पर भी भारी घोटाला!
जिस GSM की प्लास्टिक उपयोग होनी चाहिए,
उसकी जगह इतनी घटिया वर्ल्ड-क्लास “नूरानी प्लास्टिक” डाली गई है कि
ग्रामीणों ने मौके पर ही कहा—
“यह तो धूप भी नहीं झेल पाएगी।”
और मज़ेदार बात—विभागीय इंजीनियर मौजूद रहते हुए सब देखते रहे!
*निर्माण स्थल पर सूचना-पट्ट गायब – भ्रष्टाचार छुपाने की कोशिश साफ!*
किसी भी सरकारी काम में बोर्ड अनिवार्य है।
लेकिन यहाँ बोर्ड नहीं लगाया गया।
क्यों?
क्योंकि
लागत,
ठेकेदार,
कार्यकाल,
ज़िम्मेदार अधिकारी
सबकुछ छुपाया जा सके।
यह छिपाव नहीं—भ्रष्टाचार का प्रमाण है।
ग्रामीणों का आरोप – “यह नहर दो साल भी नहीं टिकेगी, पैसा जेब में जा रहा है”
ग्रामीणों ने कहा:
“हम दिन में देख रहे हैं कि कैसे घटिया सामान से करोड़ों का काम निपटाया जा रहा है।
यह नहर तो थोड़ी बारिश में बह जाएगी।”
अगर ग्रामीण यह देख सकते हैं,
तो विभाग क्यों नहीं देख रहा?
या फिर देखना नहीं चाहता?
इंजीनियर का गोल–मोल जवाब: ‘हमने निर्देश दिए हैं’
निर्माण की वास्तविकता सामने आने पर जब इंजीनियर से सवाल पूछा गया,
उन्होंने वही पुराना सरकारी राग अलापा—
“हमने गुणवत्ता से कार्य करने कहा है।”
अगर कहा है तो फिर
घटिया छड़, गलत गिट्टी, टूटे वाइब्रेटर, छोटी मिक्सर मशीनें और 4 इंच की ढलाई—
इनका जिम्मेदार कौन?
निर्देश या तो दिए नहीं गए,
या दिए गए लेकिन जमीनी सच्चाई में वे पूरे विभाग के साथ डूब गए।
सबसे बड़ा सवाल — क्या यह जलाशय किसानों के लिए बना था या किसी और की जेब भरने के लिए?
15 साल बाद नहर सुधार के नाम पर करोड़ों स्वीकृत हुए,
लेकिन निर्माण देखकर लगता है—
यह परियोजना किसानों की नहीं,
भ्रष्टाचारियों की फसल बन चुकी है।
क्या जांच होगी या फाइलों में दफन कर दिया जाएगा?
अब देखना यह है कि—
क्या दोषी ठेकेदार पर कार्रवाई होगी?
क्या इंजीनियरों की भूमिका जांच के घेरे में आएगी?
क्या विभाग इस खुलासे के बाद जागेगा?
या फिर
यह घोटाला भी बाकी घोटालों की तरह सरकारी फाइलों के कब्रिस्तान में दफन कर दिया जाएगा।





