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फाइलों में दफन ‘अपना घर’ का सपना और प्रशासनिक उदासीनता।

कोरिया रिपोर्ट प्रदीप पाटकर

फाइलों में दफन ‘अपना घर’ का सपना और प्रशासनिक उदासीनता।

कोरिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ (ग्रामीण) का लक्ष्य हर गरीब के सिर पर पक्की छत मुहैया कराना था। लेकिन कोरिया जिले में यह योजना विकास की इबारत लिखने के बजाय प्रशासनिक ढुलमुल रवैये और सरकारी लेटलतीफी की शिकार होती नजर आ रही है।आंकड़ों के जाल में उलझते गरीब।सत्र 2025-26 के लिए कोरिया जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में 4,502 आवास स्वीकृत किए गए। कागजों पर ये आंकड़े सुखद लग सकते हैं, लेकिन धरातल की हकीकत यह है कि ये घर आज भी ‘निर्माणाधीन’ की श्रेणी में अटके हुए हैं। वनांचल क्षेत्रों में स्थिति और भी भयावह है, जहाँ न तो निर्माण सामग्री समय पर पहुँच पा रही है और न ही किस्तों का भुगतान समय पर हो रहा है।एसी कमरों की फाइलों में दम तोड़ती योजना।विडंबना देखिए कि जिस योजना की निगरानी जिला पंचायत स्तर से लेकर ग्राम पंचायत तक के अधिकारियों को करनी थी, वह आज अधिकारियों के रसूख और लापरवाही की भेंट चढ़ गई है। ग्रामीण क्षेत्रों से यह शिकायत आम है कि जिले के आला अधिकारी एसी कमरों में बैठकर केवल हस्ताक्षरों तक सीमित हैं।सवाल यह उठता है कि क्या किसी बड़े अधिकारी ने इन निर्माणाधीन आवासों का भौतिक सत्यापन करने की जहमत उठाई? जवाब ‘ना’ में मिलता है।अधूरे घर, टूटती उम्मीदें।सिर्फ इस सत्र की बात नहीं है, पूर्व के सत्रों में स्वीकृत मकान भी आज खंडहरनुमा खड़े हैं। कहीं दीवारें खड़ी हैं तो कहीं छत गायब है। हितग्राही दूसरी और तीसरी किस्त के लिए दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं, लेकिन पंचायत से लेकर जिला कार्यालय तक उनकी समस्याओं का कोई ठोस समाधान नहीं मिल रहा।

प्रशासन की जवाबदेही कहाँ?

अगर शासन की योजनाएं पात्र लोगों तक समय पर नहीं पहुँच रही हैं, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? वनांचल के ग्रामीणों की चुप्पी को उनकी कमजोरी न समझा जाए। प्रधानमंत्री की इस महत्वाकांक्षी योजना का कोरिया जिले में ‘दम तोड़ना’ सीधे तौर पर जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

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