भ्रष्टाचार का ‘कॉकटेल’: पंचायत से जिला मुख्यालय तक बिछा है साठगांठ का जाल, बजट डकारने में सब ‘साझेदार’!

एमसीबी (मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर) | विशेष पड़ताल।

जिले में विकास कार्यों के नाम पर जो ‘बंदरबांट’ मची है, वह किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है। यह एक सुव्यवस्थित ‘भ्रष्टाचार का चक्रव्यूह’ है, जिसमें नीचे से लेकर ऊपर तक के अधिकारी और कर्मचारी एक ही माला के मोती बने हुए हैं। शौचालय निर्माण हो या अन्य पंचायत कार्य, हर फाइल पर ‘कमीशन का ठप्पा’ लगने के बाद ही काम आगे बढ़ता है।
ग्राउंड लेवल की चौकड़ी: सरपंच, सचिव और सहायक सचिव का ‘त्रिदेव’ अवतार।

भ्रष्टाचार की शुरुआत पंचायत स्तर से होती है। सरपंच, सचिव और सहायक सचिव की तिगड़ी सबसे पहले उन कार्यों की पहचान करती है जहाँ से बजट निकाला जा सके। बिना जरूरत के शौचालय या निर्माण कार्य का प्रस्ताव बनाना इन्हीं की जिम्मेदारी होती है। धरातल पर काम हो या न हो, कागजों पर उसे ‘ओके’ करने का खेल यहीं से शुरू होता है।
तकनीकी स्वीकृति का ‘खेल’: सहायक तकनीकी अधिकारी की भूमिका।
कोई भी निर्माण कार्य बिना तकनीकी स्वीकृति के आगे नहीं बढ़ता। यहाँ सहायक तकनीकी अधिकारी की भूमिका संदिग्ध हो जाती है। गुणवत्ताहीन निर्माण को भी ‘उच्च स्तरीय’ बताना और अधूरे काम का ‘वैल्युएशन’ (मूल्यांकन) बढ़ा-चढ़ाकर करना इनका काम है। जब तक इनका हिस्सा तय नहीं होता, तब तक फाइल पर तकनीकी मुहर नहीं लगती।
फाइलों का ‘ब्लैक होल’: विकासखंड समन्वयक और जनपद पंचायत।
जब फाइल जनपद पंचायत पहुँचती है, तो वहां विकासखंड समन्वयक (बीएमओ) और जनपद के बाबू सक्रिय हो जाते हैं। इनका काम है पंचायतों से आने वाली फाइलों को ‘मैनेज’ करना। सूत्रों का कहना है कि जनपद स्तर पर बैठे ये जिम्मेदार अधिकारी केवल उन्हीं फाइलों को हरी झंडी देते हैं, जिनमें ‘ऊपर’ तक पहुँचाने का इंतजाम पुख्ता होता है। जनपद पंचायत का मौन समर्थन ही इस लूट को खाद-पानी देता है।
जिला पंचायत की ‘रहस्यमयी चुप्पी’: सीईओ और उच्च अधिकारियों पर सवाल।
भ्रष्टाचार की यह गूँज जिला पंचायत सीईओ और जनपद के बड़े अधिकारियों के कानों तक न पहुँचे, यह नामुमकिन है। लेकिन विडंबना देखिए कि करोड़ों के वारा-न्यारा होने के बावजूद जिला मुख्यालय से कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। जिला पंचायत में बैठे बाबू और उच्च अधिकारी ‘सब ठीक है’ का चश्मा पहनकर बैठे हैं। क्या यह ‘मौन’ उनकी मूक सहमति है या इस बंदरबांट में उनकी भी हिस्सेदारी है?
कागजों पर ‘स्वर्ग’, जमीन पर ‘नरक’
इस पूरी साठगांठ का नतीजा यह है कि सरकार की नजरों में एमसीबी जिला विकास की नई ऊंचाइयों को छू रहा है, लेकिन वनांचल के ग्रामीण आज भी दूषित पानी और जर्जर शौचालयों के बीच जीने को मजबूर हैं। अधिकारियों की यह ‘जुगलबंदी’ आम जनता के हक को मारकर अपनी तिजोरियां भरने में लगी है।



