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विशेष कवरेज: बौरीडाँड में ‘लोकतंत्र’ की बलि चढ़ाता ‘लूटतंत्र’!

फाइलों में 'रामराज्य' और धरातल पर 'अंधेरगर्दी': विकास का दिवाला

 

एमसीबी।मनेन्द्रगढ़ की ग्राम पंचायत बौरीडाँड से आ रही खबरें केवल भ्रष्टाचार की कहानियां नहीं हैं, बल्कि यह हमारे पंचायती राज व्यवस्था के खोखलेपन का जीवंत प्रमाण हैं। यहाँ सरकारी कागजों पर तो योजनाओं की चमक ऐसी है कि मानो स्वर्ग उतर आया हो, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। फाइलों में विकास दौड़ रहा है, पर गांव की गलियों में आज भी अंधेरा और अव्यवस्था का बोलबाला है।

मासूमों की प्यास बनाम प्रशासनिक विलासिता: ‘हर घर जल’ का कड़वा सच

 

हैरानी की बात यह है कि एक तरफ प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी योजनाएं—चाहे वह ‘हर घर जल’ हो या ‘स्वच्छ भारत मिशन’—कागजों पर शत-प्रतिशत सफलता का दम भरती हैं, वहीं दूसरी ओर बौरीडाँड के स्कूल और आंगनवाड़ी में मासूम बच्चे पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। यह स्थिति केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक नैतिक अपराध है। क्या प्रशासन की जिम्मेदारी केवल फाइलों पर हस्ताक्षर करने तक सीमित है?

‘सरपंच’ मतलब सेवा नहीं ‘आतंक’: रसूखदारों की दबंगई का बोलबाला।

ग्रामीणों के आरोप बेहद गंभीर हैं—सरपंच पति का रसूख और सरपंच की दबंगई ने ग्रामीणों का जीना मुहाल कर रखा है। जब ‘सरपंच’ शब्द का अर्थ ‘जनसेवा’ के बजाय ‘आतंक’ और ‘दबंगई’ हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि वहां लोकतंत्र की जड़ें सूख चुकी हैं। जब रक्षक ही पुलिस और प्रशासन के प्रभाव का गलत उपयोग कर भक्षक की भूमिका में नजर आने लगे, तो आम ग्रामीण अपनी गुहार लेकर किसके पास जाए?

सरकारी खजाने का ‘बारा-न्यारा’: बंदरबांट में डूबा बजट।

 

कागजों पर धड़ल्ले से शौचालय बन रहे हैं और बोर खनन दिखाया जा रहा है, लेकिन असलियत में सरकारी पैसे का जो ‘बंदरबांट’ हो रहा है, वह किसी बड़े घोटाले की ओर इशारा करता है। ग्राम पंचायत का सचिव और सरपंच यदि आपसी मिलीभगत से सरकारी खजाने को अपनी निजी जागीर समझने लगें, तो विकास की किरण का गाँव तक पहुँचना नामुमकिन है। यह सीधा-सीधा जनता की गाढ़ी कमाई पर डाका है।

जिला पंचायत CEO और जनपद प्रशासन की ‘रहस्यमयी चुप्पी’ पर सवाल।

इस पूरे खेल में CEO साहब और जनपद प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। क्या वे इस ‘दबंगई’ से अनजान हैं या फिर इस खेल में उनकी मौन स्वीकृति शामिल है? क्या धरातल की प्यास और बच्चों की मजबूरी अधिकारियों की फाइलों में दर्ज नहीं होती? वातानुकूलित कमरों में बैठकर विकास की रूपरेखा तैयार करने वाले अधिकारी आखिर जमीनी हकीकत से इतने दूर क्यों हैं?

निष्पक्ष जांच की मांग: अब आक्रोश की बारी!

बौरीडाँड की जनता का आक्रोश अब केवल शिकायतों तक सीमित नहीं रहेगा। यह वक्त है कि जिला प्रशासन अपनी गहरी नींद से जागे, कागजी प्रस्तावों के खेल को बंद करे और धरातल पर जाकर निष्पक्ष जांच करे। यदि समय रहते इन ‘दबंगों’ पर नकेल नहीं कसी गई और बच्चों को पानी व ग्रामीणों को उनके अधिकार नहीं मिले, तो व्यवस्था से जनता का विश्वास पूरी तरह उठ जाएगा।

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