न्याय के मंदिर से सड़क के ‘संग्राम’ तक: मनेन्द्रगढ़ में कानून का मखौल।


मनेन्द्रगढ़। जिसे ‘न्याय का मंदिर’ कहा जाता है, वहां के पुरोहित यानी वकील जब सड़क पर उतरकर ‘जलाद’ की भूमिका निभाने लगें, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। छत्तीसगढ़ के मनेन्द्रगढ़ में हाल ही में हुई हिंसा की घटना ने न केवल पेशे की गरिमा को तार-तार किया है, बल्कि पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गहरा दाग लगा दिया है।
सरेआम ‘मॉब लिंचिंग’ और पुलिस की चुप्पी

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। बीच सड़क पर एक शख्स को घेराबंदी कर पीटा जा रहा है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस “खूनी खेल” में कानून के जानकारों का नाम सामने आ रहा है।
वीडियो साक्ष्य: वायरल फुटेज में साफ दिख रहा है कि किस तरह भीड़ ने एक व्यक्ति को घेरकर हमला किया।
पुलिस की भूमिका: घटना के इतने समय बाद और पुख्ता वीडियो सबूत होने के बावजूद पुलिस की ‘चुप्पी’ कई गहरे सवाल खड़े करती है। क्या रसूखदारों के दबाव में खाकी ने घुटने टेक दिए हैं?
वकील, नेता और कर्मचारी का ‘खूनी’ गठजोड़
स्थानीय गलियारों में चर्चा है कि यह महज एक तात्कालिक विवाद नहीं, बल्कि एक गहरा नेक्सस (गठजोड़) है। जब राजनीति, वकालत और सरकारी तंत्र के कुछ भ्रष्ट तत्व एक साथ मिल जाते हैं, तो वे खुद को कानून से ऊपर समझने लगते हैं। मनेन्द्रगढ़ की यह घटना इसी गठजोड़ का एक वीभत्स परिणाम नजर आती है।

अब बार काउंसिल के पाले में गेंद
हिंसा की इस घटना के बाद अब सबकी नजरें राज्य बार काउंसिल पर टिकी हैं।
“वकालत एक गरिमामय पेशा है। यदि कोई वकील सड़क पर गुंडागर्दी करता पाया जाता है, तो उसका लाइसेंस रद्द होना चाहिए ताकि समाज में एक कड़ा संदेश जाए।” — कानूनी विशेषज्ञों की राय
बार काउंसिल को अब तय करना है कि क्या वे अपने सदस्यों के इस कृत्य पर पर्दा डालेंगे या ‘न्याय’ के सिद्धांत को सर्वोपरि रखते हुए कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई करेंगे।
पक्ष वर्तमान स्थिति अपेक्षित कार्रवाई
पुलिस प्रशासन संदिग्ध मौन और सुस्त जांच दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी और FIR
बार काउंसिल शिकायत का इंतजार / प्रारंभिक संज्ञान लाइसेंस का निलंबन और नैतिक जांच
आम जनता भय और आक्रोश का माहौल सुरक्षा का आश्वासन और पारदर्शी न्याय
महेंद्र शुक्ला की कलम से निष्कर्ष एवं समाधान।
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और न्यायपालिका की साख दांव पर है। यदि सड़क पर होने वाली इस गुंडागर्दी को ‘काले कोट’ की आड़ में संरक्षण मिला, तो आम आदमी का न्याय व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा। मनेन्द्रगढ़ की सड़क पर बहा खून अब जवाब मांग रहा है।



