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चिरमिरी में राममय हुआ वातावरण , मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने श्रीराम कथा में लिया आशीर्वाद* *जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज से प्रदेश की सुख-समृद्धि और विकास की कामना* *151 फीट हनुमान प्रतिमा स्थापना के गुरु आदेश को मुख्यमंत्री ने किया स्वीकार*

चिरमिरी में राममय हुआ वातावरण, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने श्रीराम कथा में लिया आशीर्वाद* *जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज से प्रदेश की सुख-समृद्धि और विकास की कामना* *151 फीट हनुमान प्रतिमा स्थापना के गुरु आदेश को मुख्यमंत्री ने किया स्वीकार*

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चिरमिरी/एमसीबी, ।  एमसीबी जिले के चिरमिरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री स्टेडियम में आयोजित नव दिवसीय श्रीराम कथा महोत्सव में गुरुवार को पूरा वातावरण राममय हो गया। प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय श्रीराम कथा में शामिल हुए और प्रख्यात संत जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज से छत्तीसगढ़ की सुख-समृद्धि, खुशहाली एवं निरंतर विकास के लिए आशीर्वाद प्राप्त किया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह समस्त प्रदेशवासियों का सौभाग्य है कि उन्हें देश के महान संत के सान्निध्य में भगवान श्रीराम की कथा श्रवण करने का अवसर मिल रहा है। उन्होंने कहा कि रामकथा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज को संस्कार, सद्भाव, मर्यादा और मानवता का संदेश देने का माध्यम है।

इस अवसर पर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल सहित बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, गणमान्य नागरिक एवं हजारों श्रद्धालु उपस्थित रहे।

 

*151 फीट हनुमान प्रतिमा स्थापना का गुरु आदेश*

 

व्यासपीठ पर विराजमान जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को गुरु के नाते चिरमिरी में 151 फीट ऊंची भगवान हनुमान जी महाराज की भव्य प्रतिमा स्थापित कराने का आदेश दिया। मुख्यमंत्री ने गुरु आदेश को सहर्ष स्वीकार करते हुए चिरमिरी में 151 फीट की हनुमान प्रतिमा स्थापित कराने पर अपनी सहमति जताई तथा व्यासपीठ के समक्ष सिर झुकाकर आदेश को स्वीकार किया। इस घोषणा के साथ ही कथा पंडाल जय श्रीराम और बजरंगबली के जयकारों से गूंज उठा।

 

*धनुष भंग और सीता-राम विवाह प्रसंग का हुआ जीवंत वर्णन*

 

विगत 17 मई से आयोजित श्रीराम कथा के पाँचवें दिन जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज ने धनुष भंग एवं सीता-राम विवाह प्रसंग का अत्यंत भावपूर्ण और विस्तृत वर्णन किया। कथा के दौरान उन्होंने बताया कि मिथिला नरेश राजा जनक द्वारा आयोजित स्वयंवर में यह शर्त रखी गई थी कि जो राजकुमार भगवान शिव के दिव्य धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी से माता सीता का विवाह होगा।

 

स्वयंवर में अनेक पराक्रमी राजा और राजकुमार उपस्थित हुए, किंतु कोई भी उस दिव्य धनुष को हिला तक नहीं सका। तब ऋषि विश्वामित्र की आज्ञा से भगवान श्रीराम आगे बढ़े और सहज भाव से धनुष उठाकर जैसे ही प्रत्यंचा चढ़ाई, धनुष भंग हो गया। इस अद्भुत घटना से जनकपुर जय-जयकार से गूंज उठा और राजा जनक ने प्रसन्न होकर सीता का विवाह श्रीराम से निश्चित किया।

 

कथा में आगे बताया गया कि अयोध्या से राजा दशरथ बारात लेकर मिथिला पहुंचे, जहां ऋषि वशिष्ठ एवं विश्वामित्र के मार्गदर्शन में भगवान राम और माता सीता का विधि-विधान से विवाह संपन्न हुआ। इसी शुभ अवसर पर लक्ष्मण का विवाह उर्मिला से, भरत का मांडवी से तथा शत्रुघ्न का विवाह श्रुतकीर्ति से संपन्न हुआ। विवाह के उपरांत चारों राजकुमार अपनी पत्नियों के साथ अयोध्या लौटे।

 

जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज ने कहा कि भगवान राम और माता सीता का मिलन मर्यादा, आदर्श और धर्म का सर्वोच्च प्रतीक है। उन्होंने अपने प्रवचन में कहा कि रामकथा मनुष्य को सत्य, संयम और कर्तव्य पालन की प्रेरणा देती है।

 

*बचपन को शुद्ध करो, यौवन को प्रबुद्ध करो और बुढ़ापे को सिद्ध करो*

 

व्यासपीठ से श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज ने कहा कि जीवन को सार्थक बनाने के लिए “बचपन को शुद्ध, यौवन को प्रबुद्ध और बुढ़ापे को सिद्ध” करना आवश्यक है। उन्होंने सनातन धर्म की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में परमात्मा स्वयं पुत्र बनकर अवतरित होते हैं और मानव जीवन को धर्म एवं मर्यादा का मार्ग दिखाते हैं।

 

कथा पंडाल में हजारों श्रद्धालुओं ने रामकथा का रसपान किया और पूरे क्षेत्र में भक्ति, श्रद्धा एवं आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत वातावरण देखने को मिला।

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