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मनेंद्रगढ़ शिक्षा विभाग में ‘सुपर टीचर’ राज?” सहायक शिक्षक बनी निरीक्षण अधिकारी! प्राचार्यों से भी बड़ा पद या रसूख का खेल?

मनेंद्रगढ़ शिक्षा विभाग में ‘सुपर टीचर’ राज?” सहायक शिक्षक बनी निरीक्षण अधिकारी! प्राचार्यों से भी बड़ा पद या रसूख का खेल?

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मनेंद्रगढ़ / एमसीबी:- मनेंद्रगढ़ जिले का शिक्षा विभाग इन दिनों अपने कारनामों से शिक्षा व्यवस्था कम और “विशेष रसूख तंत्र” ज्यादा नजर आने लगा है। जिले में ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरे विभागीय ढांचे, नियम-कानून और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

कक्षा 5वीं एवं 8वीं बोर्ड परीक्षाओं के दौरान गठित उड़नदस्ता दल में पीएस कलमडांड की एक सहायक शिक्षिका खुशबू दास की नियुक्ति कर दी गई। उड़नदस्ता दल का उद्देश्य परीक्षा केंद्रों का निरीक्षण, परीक्षा संचालन की निगरानी और अनियमितताओं पर रिपोर्ट तैयार करना होता है। सामान्यतः यह जिम्मेदारी जिला शिक्षा अधिकारी, विकासखंड शिक्षा अधिकारी, प्राचार्य अथवा प्रशासनिक अधिकारियों को दी जाती है।

 

लेकिन मनेंद्रगढ़ में शायद नियमों की किताब अलग ही चल रही है।

 

आरोप है कि उक्त सहायक शिक्षिका ने परीक्षा केंद्रों में पहुंचकर न केवल निरीक्षण किया, बल्कि विद्यालयों की निरीक्षण पंजियों में बाकायदा टिप्पणी दर्ज की, निरीक्षण अवलोकन टिप लिखी और लंबे-चौड़े हस्ताक्षर के नीचे “SRG – SCERT” लिखकर स्वयं को अधिकारिक निरीक्षणकर्ता की तरह प्रस्तुत किया।

 

अब बड़ा सवाल यह है कि—

क्या SCERT का SRG पद अब प्रशासनिक निरीक्षण का अधिकार भी देने लगा है?

क्या एक सहायक शिक्षक अब प्राचार्यों और अधिकारियों के ऊपर बैठकर स्कूलों का निरीक्षण करेगा?

या फिर यह पूरा मामला केवल रसूख, संरक्षण और दबाव की राजनीति का परिणाम है?

 

जानकार बताते हैं कि SCERT के SRG का कार्य केवल प्रशिक्षण, अकादमिक सहयोग और शैक्षणिक गतिविधियों तक सीमित होता है। किसी सहायक शिक्षक को बिना सक्षम प्रशासनिक आदेश के स्कूल निरीक्षण, निरीक्षण पंजिका में टिप्पणी दर्ज करने अथवा अधिकारिक अवलोकन लिखने का वैधानिक अधिकार नहीं है।

 

फिर आखिर किसके आदेश पर यह “विशेष अधिकार” दिए गए?

क्या जिला शिक्षा अधिकारी ने नियमों को ताक पर रख दिया?

या फिर विभाग में कुछ लोगों के लिए अलग कानून चल रहा है?

 

सूत्रों की मानें तो जिले के कई अनुभवी और योग्य शिक्षकों को किनारे कर एक विशेष शिक्षिका को लगातार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी जा रही हैं। इतना ही नहीं, विभागीय गलियारों में चर्चा है कि संबंधित शिक्षिका पुराने कलेक्टर का नाम लेकर अधिकारियों और कर्मचारियों पर धौंस जमाती हैं और खुद को “ऊपर तक पहुंच” वाला बताती हैं।

 

सबसे बड़ा सवाल अब यह खड़ा हो रहा है कि—

यदि कोई सामान्य शिक्षक बिना अधिकार किसी स्कूल की निरीक्षण पंजिका में टिप्पणी लिख दे तो क्या उस पर तत्काल कार्रवाई नहीं होती?

फिर इस मामले में अब तक चुप्पी क्यों?

 

क्या सिविल सेवा आचरण नियम केवल कमजोर कर्मचारियों के लिए हैं?

क्या रसूखदार लोगों पर नियम लागू नहीं होते?

क्या मनेंद्रगढ़ शिक्षा विभाग अब “पद से नहीं, पहुंच से” संचालित हो रहा है?

 

पूरा मामला अब जिले में चर्चा का विषय बन चुका है। यदि जांच हुई तो कई बड़े प्रशासनिक और विभागीय चेहरों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ सकती है। शिक्षा विभाग की निष्पक्षता, पारदर्शिता और वैधानिक व्यवस्था पर उठे ये सवाल अब जवाब मांग रहे हैं।

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